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कठिन है डगर 2019 की

 Narender Dhawan |  2018-11-16T09:35:57+05:30

कठिन है डगर 2019 की

-नरेन्द्र धवन@दिल्ली अपटूडेट

(ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर)

भारत गणराज्य संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं। जहां लोग हर पांच साल में सरकार, सत्ता, नेता को रखने या बदलने की ताकत का अहसास अपने वोट के अधिकार के माध्यम से करते हैं।

या यूं भी कहे कि चुनावी मेला पांच साल में कई बार आता है। कभी विधायक, निगम पार्षद, सांसद, पंचायत चुनाव, आदि के रूप में हर डेढ़ दो वर्ष में चुनावो का मेला और दंगल (अखाड़ा) लगता और सजता रहता हैं। इसी कड़ी में देश में 2019 के सांसद चुनाव सभी राजनैतिक दलों व नेताओं के भविष्य का निर्धारण करेगा।

चलिये बात करते हैं देश का दिल व राजधानी दिल्ली की एवम दिल्ली की राजनीति व पार्टियों की। दिल्ली से 7 लोकसभा संसदीय सीट है। जिस पर सातो सांसद वर्तमान सत्तारूढ़ भाजपा सरकार के है, जो कि वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में लड़े गए चुनाव में जीतकर आए थे, यहां यह कहना भी गलत न होगा कि उस समय केवल और केवल नरेंद्र मोदी के नाम पर देश की जनता ने उन्हें वोट दिया और, उम्मीदवार को बिना जाने, सोचे, समझे, वोट देकर सांसद बना संसद भेजा। बीजेपी ने प्रचंड बहुमत हासिल किया और अपने राजनैतिक इतिहास में पहली बार 282 सीट प्राप्त कर सरकार में आई और तत्कालिन सत्तारूढ़ कांगेस को लगभग मटियामेट कर दिया। जहां 10 वर्ष से कांग्रेस केन्द्र की सत्ता में थी, उसे महज 44 सीटें देश भर में मिली और विपक्ष के नाम पर कांग्रेस ही एक मात्र सबसे बड़ी पार्टी बनी। वर्ष 2015,दिल्ली में "आम आदमी पार्टी "ने अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व में चुनाव लड़ा और यहाँ दिल्ली में भी इतिहास बना,"आम आदमी पार्टी "67 सीट से जीतने में कामयाब हुई। 70 में से बीजेपी को मात्र 3 सीट मिली हांलाकि उपचुनाव में राजौरी गार्डन की सीट बीजेपी दुबारा जीत गई और संख्या 4 हो गई। कांग्रेस का दिल्ली में खाता भी न खुला और संख्या 0 हो गई। गौरतलब है कि यहां दिल्ली में भी कांग्रेस ने लगातार 15 वर्ष 1998 से वर्ष 2013 तक राज किया। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में कांगेस और आम आदमी पार्टी दोनो को ही दिल्ली में कोई सीट न मिली। अब प्रमुख बिन्दू पर प्रकाश डालते हैं। क्या बीजेपी अपने सातों सांसदो को दिल्ली से जीता पाएगी? क्या भाजपा अपनी प्रतिष्ठा बरकरार रख पाएगी? या आम आदमी पार्टी दिल्ली में लोकसभा "सांसद "का खाता खोल पाएगी या कांग्रेस कोई करिश्मा दिखा पाएगी? एक तरफ दिल्ली MCD में जहां बीजेपी काबिज है तो दूसरी तरफ दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार है, परंतु आम जनता की परेशानी और नाराजगी का सामना दोनो दलों "पार्टियों "को निकट चुनाव में उठाना पड़ सकता है, आज दिल्ली सीलिंग, तोड़-फोड़, अवैध निर्माण, प्रदूषण आदि परेशानियों से गुजर रही है। जिस पर दिल्ली सरकार या MCD काबिज भाजपा दोनों ही फिलहाल आम जनता के विषय में कोई भी कुछ करना नही चाहता या लाचार हैं। जनता के सामने रोजी रोटी का मसला पहले है। नोटबंदी, जीएसटी और आए दिन, नित नए" तुगलकी "फरमानो से जनता टूट रही है या यूं कहे कि रोटी तक नसीब नही हो पा रही है।

व्यापारियों में खौफ है कि न जाने कब कहां, क्या, हो जाए। दिल्ली सरकार जनता के लिए नए-नए लोक लुभावने वादे और योजनाएं ला रही हैं जो कि चुनावी स्टंट ही न रह जाऐं, क्योंकि मुख्य विषय योजना बनाना नहीं अपितु कितनी जल्दी इसे लागू कर जनता को फायदा दिलाया जाए। दोनो पार्टियां कागज़ों पर ही योजनाओं का श्री गणेश कर रहे हैं। परंतु काम होता नज़र नहीं आता। निसंदेह स्वास्थ्य और शिक्षा "आम आदमी पार्टी "ने सुधारी हैं तो वही विकास और राम मंदिर, नरेन्द्र मोदी आदि को लेकर बीजेपी तैयार है।

दिल्ली की राजनीति में आम आदमी पार्टी अपनी साख को लेकर अधिक चिन्तित नज़र आती है, क्योंकि 66 सीटों पर पार्टी के जीते हुए MLA हैं। इस आधार पर यदि सरकार ने अच्छे और बेहतर कार्य किए हैं। तो जनता दिल्ली की 7 लोकसभा सीटें जिताने में सहायक होगी यदि नही तो दिल्ली सरकार से दिल्ली की जनता का मोह भंग होना पार्टी के लिए.........होगा। यहां गौरतलब है कि आम आदमी पार्टी के कई MLA पार्टी में रहते हुए भी पार्टी के साथ नही हैं, कपिल मिश्रा, संदीप कुमार, कर्नल सहरावत, पंकज पुष्कर आदि।

हाल ही में पार्टी के दो बड़े नेता आशुतोष और आशीष खेतान का पार्टी छोड़ना भी नुकसानदेह हो सकता हैं। कुमार विश्वास जैसे बड़े नेता व प्रख्यात कवि ने पहले ही मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के खिलाफ मोर्चा खोल रखा हैं। वह सार्वजनिक रूप से हर मंच पर पार्टी प्रमुख अरविन्द केजरीवाल के खिलाफ लगातार राजनीतिक प्रहार करते हैं।

कहते हैं युवा वर्ग सभ्य समाज को स्थापित करने में प्रमुख रोल अदा करता है। आज युवा वर्ग ह्रऋ्र मुद्दे पर आम आदमी पार्टी से किनारा कर चुका जिसका वायदा 2015 चुनाव में किया गया था। डुसू चुनाव में परिणाम नज़र आया। आम आदमी पार्टी ने आईसा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और कोई भी सीट न जीत सकी, हालांकि लोकल कॉलेज स्तर पर कई सीटे जीती। आम आदमी पार्टी के विधायक और निगम पार्षद की कारगुजारियों से लोग व व्यापारी नाराज हैं। इसका भी खामियाजा 2019 के चुनाव में देखने को मिल सकता है। यहां दोनो पार्टियों की स्थिति 2019 को लेकर असमंजस में है और ऊंट किस करवट बैठेगा यह तो भविष्य के गर्भ में छिपा हैं। हां यहां एक बात जरूर कहनी पड़ेगी की कांग्रेस के पास कुछ खोने को नही, उसके पास सबकुछ पाने के लिए हैं। और कहीं न कहीं दबी जुबान में लोग कांग्रेस और शीला दीक्षित, राजेश जैन, शालू मलिक को याद करने लगे हैं, चर्चा करने लगे हैं। और इस बात को अरविंद केजरीवाल भी शायद मानने लगे हैं कि कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक जो आम आदमी पार्टी के साथ चला गया था वह शायद वापिस कांग्रेस की ओर जाने लगा है, तभी तो अरविंद मंच से कांग्रेस को वोट न देने की अपील करतें हैं, जो इस बात का इशारा करता है कि शायद कांग्रेस वापसी की राह पर हैं।

'अपनी तो आदत है कि हम कुछ नही कहतें'

'उनको ये शिकायत है कि हम कुछ नही कहतें '

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Narender Dhawan ( 32 )

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