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पीठ का गठन फिर से किया जाएगा, अगली सुनवाई 29 जनवरी को

 Ritu |  10 Jan 2019 6:48 AM GMT

पीठ का गठन फिर से किया जाएगा, अगली सुनवाई 29 जनवरी को

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में जजों की संविधान पीठ के समक्ष राजनीतिक रूप से संवेदनशील अयोध्या में राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले पर सुनवाई शुरू होते ही और गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान पांच जजों की पीठ में शामिल जस्टिस यूयू ललित के इस मामले से खुद को अलग कर लिया। जिसके बाद अब पीठ का गठन फिर से किया जाएगा। इस मामले की अगली सुनवाई 29 जनवरी को होगी। और सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने अदालत में जस्टिस यूयू ललित पर सवाल उठाते हुए कहा कि 1994 में यूयू ललित कल्याण सिंह के लिए पेश हो चुके हैं।

राजीव धवन के सवाल उठाने के बाद चीफ जस्टिस ने बाकी जजों के साथ मशविरा किया। इस पर जस्टिस यूयू ललित ने सुनवाई से अपने आप को अलग करने की बात कही। इस मुद्दे को उठाते हुए राजीव धवन ने कहा कि मुझे अफसोस है क्‍योंकि इस तरह के मसले को उठाना ठीक नहीं लगता। इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि आपको अफसोस करने की कोई जरूरत नहीं है। जस्टिस यूयू ने अपना पक्ष स्पष्ट करते हुए कहा कि जब वे वकील थे, तब वे बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में सुनवाई के दौरान बतौर वकील एक पक्ष की तरफ से पेश हुए थे और अब मैं खुद को इस मामले से हटाना चाहता हूं। इस पर मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगई ने कहा कि सभी जजों का मत है कि अयोध्या जमीन विवाद मामले में जस्टिस यूयू ललित का सुनवाई करना सही नहीं होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्मभूमि विवाद मामले को अहम मानते हुए इसे पांच न्यायाधीशों की पीठ को सौंपा है, पहले भी कई बार मुस्लिम पक्ष की ओर से मामले को संविधान पीठ को भेजने की मांग की गई थी। यहां तक कि पूर्व में हुई सुनवाई में मुस्लिम पक्ष की ओर से पेश वकील राजीव धवन ने अयोध्या मामले को पांच जजों को भेजने की अपनी मांग पर जोर देते हुए यह तक कोर्ट में कहा था कि जब निकाह हलाला का मामला पांच जजों की संविधान पीठ को विचार के लिए भेजा जा सकता है, तो इसे क्यों नहीं भेजा जा सकता। उनकी दलील थी कि इस मुकदमें का भी व्यापक असर है। जस्टिस यूयू ललित के अलग होने के बाद इसका गठन फिर से होगा। नियम कानून में मुख्य न्यायाधीश को सुनवाई पीठ गठित करने का विस्तृत अधिकार है और वे किसी भी मामले की सुनवाई के लिए किसी भी संयोजन की पीठ गठित कर सकते हैं।

अयोध्या में राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद से संबंधित 2.77 एकड़ भूमि के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 30 सितंबर, 2010 के 2:1 के बहुमत के फैसले के खिलाफ शीर्ष अदालत में 14 अपीलें दायर की गयी हैं। उच्च न्यायालय ने इस फैसले में विवादित भूमि सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला विराजमान के बीच बराबर- बराबर बांटने का आदेश दिया था। इस फैसले के खिलाफ अपील दायर होने पर शीर्ष अदालत ने मई 2011 में उच्च न्यायालय के निर्णय पर रोक लगाने के साथ ही विवादित स्थल पर यथास्थिति बनाये रखने का आदेश दिया था।

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