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कुंती और ब्लूटूथ

 Manish Kumar Gupta |  15 Oct 2018 9:57 AM GMT

दोस्तों, प्राचीन भारत वैज्ञानिक रूप से काफी विकसित रहा है, यह अलग बात है कि वह विज्ञान पुरातन काल में ही विस्मृत हो गया और हम सहेज कर नहीं रख पाये | आज से 200-250 वर्ष पूर्व महाभारत व रामायण के कई दृष्टांत हमें सपने जैसे लगते होंगे और कुछ कथाओं के हिस्से काल्पनिक महसूस होते होंगे | लेकिन जैसे-जैसे विज्ञान के क्षेत्र में विकास हुआ और आधुनिक विज्ञान को जब पुराणों की उन कथाओं से जोड़कर देखा गया तो पाया कि प्राचीन काल का विज्ञान न केवल आज के विज्ञान के समानांतर विकसित था वरन कहीं-कहीं उससे आगे था और तब हमें अपने धार्मिक ग्रंथों की कथायें सत्य महसूस होने लगी। सम्भवत: आज भी ऐसी कई कथायें हमें कपोल-कल्पना लगती होंगी जो हो सकता हैं कि आने वाले समय में विज्ञान के और ज्यादा विकसित होने पर सत्य प्रतीत हों | त्रेता व द्वापर युग में कई ऐसी घटनायें घटीं जो यह सिद्ध करती हैं कि प्राचीन युग का विज्ञान बेहद विकसित और दिलचस्प था | आज मैं मनीष कुमार गुप्ता, पौराणिक इतिहासकार आपको महाभारत काल की ऐसी ही एक घटना के बारे में बताता हूँ जिसमें कुंती ने ब्लूटूथ जैसी तकनीक से अपने पुत्रों को जन्म दिया जो आज के विज्ञान की तकनीक के इस्तेमाल का दिलचस्प उदाहरण है |

मोबाइल और ब्लूटूथ के आविष्कार से पहले कुंती द्वारा नियोग तकनीक द्वारा बिना परपुरुष का स्पर्श किये अपने पुत्रों के जन्म देनें की कहानी को अब तक एक काल्पनिक और असंभव समझा जाता रहा लेकिन वर्तमान स्थिति में आज अब मोबाईल व ब्लूटूथ तकनीक अपने चरम पर है तो हम यह समझ सकते हैं कि महाभारत में लिखी कुंती के द्वारा बच्चों को जन्म दिए जाने की कथा सच रही होगी और कुंती ने अपने पुत्रों को ब्लूटूथ तकनीक जैसी ही किसी वैज्ञानिक विधि से जन्म दिया होगा |

#द्वापर_युग_में_कुंती

कुंती महाराजा शूरसेन की पुत्री और भगवान कृष्णा की बुआ थी | उनके बचपन का नाम राजकुमारी पृथा था | महाराजा शूरसेन के ममेरे भाई राजा कुन्तिभोज की कोई संतान नहीं थी तो महाराजा शूरसेन ने पृथा को कुन्तिभोज को गोद दे दिया जिन्होंने पृथा का नाम कुंती रख दिया | एक बार महर्षि दुर्वासा राजा कुंतीभोज के यहाँ पधारे | उनके स्वागत और सत्कार की जिम्मेदारी महाराज कुन्तिभोज ने राजकुमारी कुंती को सौंपी | कुंती ने बड़े ही निष्ठा और सेवाभाव से महर्षि दुर्वासा की सेवा की | उसके सेवाभाव और आदर से प्रसन्न होकर महर्षि दुर्वासा ने कुंती को एक विशेष मंत्र वरदान में दिया | इस मंत्र के द्वारा कुंती किसी भी देवता को स्मरण करके उनसे संतान प्राप्ति कर सकती थी |

यहां मैं यह बात का उल्लेख करना उचित समझता हूं कि प्राचीन समय में जो ऋषि मुनि थे वह उस समय के वैज्ञानिक ही तो थे | उसी समय दुर्वासा ऋषि ने अपने योगबल अर्थात scientific future prediction से यह जान लिया था कि संभवत: कुंती अपने पति से संतान उत्पन्न नहीं कर पाएगी अतः बिना मांगे ही दुर्वासा ऋषि ने कुंती को एक ऐसी डिवाइस अर्थात मांत्रिक शक्ति दे दी जिसका उपयोग कर वह किसी भी देवता, मनुष्य आदि से बिना शारीरिक संपर्क किए अर्थात ब्लूटूथ टेक्नोलॉजी से संतान उत्पन्न कर सकती थी | दर असल यह डिवाइस एक मंत्र रूपी योजक एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर था जो किसी भी देवता को आहवान (invite) करके पढ़ा जाता था मानो उस देवता से टेलीपैथी संपर्क स्थापित करने की वैज्ञानिक प्रक्रिया का एप्लीकेशन कनेक्शन प्रोसीजर हो और उस मंत्र के पढ़ने पर देवता को वाईब्रेशन सिगनल / नोटिफिकेशन (लोकेशन के साथ) जाता होगा | जैसे कि कथाओं में वर्णित है कि जब कोई मनुष्य तपस्या कठोर करता था तो भगवान का सिंहासन हिलता था " उनका सिंहासन हिलता होगा" अर्थात वाईब्रेशन नोटिफिकेशन जाता है और उस देविक निमंत्रण पर वह स्वयं जाते होंगे | हमारे ऋषि मुनियों ने जब-जब देवताओं को प्रसन्न करने के लिए तप किया और उनको आहवान करने के लिए भिन्न-भिन्न मंत्र पढ़े अर्थात बिल्कुल इसी प्रक्रिया से टेलीपैथी से उन्होंने भगवान से संपर्क साधा और भगवान स्वयं इच्छित वरदान देने चले आए होंगे।

दुर्वासा ऋषि से मन्त्र प्राप्ति पर उत्सुकतावश कुंती ने उस मंत्र को इस्तेमाल करने की सोची और मंत्र पढ़कर आकाश में सूर्य देव की और देखकर स्मरण किया अर्थात एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर कनेक्ट किया और रिक्वेस्ट नोटिफिकेशन भेजा | रिक्वेस्ट को स्वीकार करते हुये भगवान सूर्य तब कुंती के सामने आ गए और मंत्र शक्ति से अभिभूत होकर उन्होंने मंत्र के आह्वान के अनुसार ब्लूटूथ तकनीक द्वारा बच्चे के जन्म के लिए आवश्यक अवशेष कुंती के शरीर में बिना स्पर्श किये प्रत्यारोपित कर दिये और उसके बाद वापिस चले गये | समय आने पर कुंती गर्भवती हो गई और प्रथम पुत्र कर्ण का जन्म हुआ | चूँकि उस समय कुंती का विवाह नहीं हुआ था अत: लोक-लाज से बचने के लिए कुंती ने अपने पुत्र को मुरैना के पास कुतबार नामक स्थान पर नदी की धारा में बहा दिया जो कालांतर कौरवों का मित्र अंग देश राजा व दानवीर कर्ण के नाम से विख्यात हुआ |

कुछ समय पश्चात् कुंती का विवाह हस्तिनापुर के महाराज पाण्डु से हुआ | महाराज पाण्डु ने मद्रराज पुत्री माद्री से भी विवाह किया था | जैसा कि हम जानते है कि कुंती के विवाह के कुछ समय पश्चात जब महाराज पांडु शिकार के लिए गए थे तब गलती से उनका तीर ऋषि कदम्ब को लगा और उन्होंने महाराज पाण्डु को शाप दिया कि वो संतानोत्पत्ति में असमर्थ रहेंगे |

#क्या_है_ब्लूटूथ_तकनीक

ब्लूटूथ बेतार (वायरलेस) संचार के लिए एक ऐसा प्रोटोकॉल है जिसमें विभिन्न इकाइयों जैसे मोबाइल फोन, लैपटॉप, संगणक, प्रिंटर या अन्य ऐसे उपकरण इसके माध्यम से एक दूसरे से जुड़ कर डेटा का आदान प्रदान कर सकते हैं । जुड़ने के लिए यह सभी उपकरण रेडियो तरंगों का उपयोग करते हैं। जो इंटरनेट न होकर इंट्रानेट अर्थात व्यक्तिगत क्षेत्र नेटवर्क या निजी प्रोटोकॉल पर कार्य करता है | इसका उद्देश्य दो डिवाइस को केबल द्वारा या अन्य माध्यम से सीधे जोड़ने बजाय उन्हें दूर से ही रेडियो तरंगो से जोड़ देता है और दोनों डिवाइसों को नजदीक आने की आवश्यकता नहीं होती है | मूलरूप से यह एक नेटवर्किग मानक है जो दो स्तरों पर काम करता है | प्रथम स्तर में यह भौतिक आधार पर रजामंदी (एग्रीमेंट) प्रदान करता है | द्वितीय स्तर में उपकरणों या उत्पादों को इस बात पर सहमत होना पड़ता है कि का प्रेषण कब होता है, "कितना है और क्या अंत में यह स्वीकार्य है" स्वीकृत होने पर डेटा का संप्रेषण अर्थात आदान प्रदान हो जाता है | जैसे एक मोबाइल से दूसरे मोबाइल में वीडियो या चित्र ब्लूटूथ द्वारा बगैर इंटरनेट के भेजे या प्राप्त किये जा सकते हैं |

दूसरे उदाहरण से समझे जैसे वर्तमान से कुछ ऐसे मोबाइल एप्प है जो अपना निजी प्रोटोकॉल और इंट्रानेट रखते है जैसे क्लोनइट (Cloneit) और शेयरइट (Shareit) आदि | इन एप्प (Apps) को इंटरनेट की आवश्यकता नहीं होती है यह एप्प दो डिवाइसों को आपस में निजी प्रोटोकॉल से (Connect) जोड़कर अपना संबंध स्थापित कर लेते है और बड़ी मात्रा में डाटा का आवागमन सुगमता से कर सकते है | निजी इंट्रानेट अर्थात (private Communication Protocol Intranet) किसी ऋषि या वैज्ञानिक के विशिष्ट तेज़ बल के समान ही तो है मानो उस तेज़ के प्रताप से एक सीधा निजी प्रोटोकॉल चैनल बन जाता हैं और वो अपना सन्देश / डाटा / भावनाएं / अवशेष दूसरी इकाई तक भेज सकें या प्राप्त कर सकते थे |

जिस तरह प्रोटोकॉल दो डिवाइस के बीच में कनेक्शन या ट्रांसपोर्ट चैनल बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है और इस सिस्टम से एक डिवाइस से दुसरे डिवाइस तक डाटा ट्रान्सफर किया जाता है. उसी प्रकार कुंती के विशेष मंत्र के आह्वान पर सूर्य भगवान आये और उसी निजी तेज़ बल इंट्रानेट अर्थात प्रोटोकॉल से उन्होंने बिना शरीरिक सम्पर्क किये बच्चे को जन्म देने के जरूरी अवशेष कुंती के गर्भ में स्थापित कर दिए जिससे की कर्ण का जन्म हुआ और अन्य पांडवों का भी जन्म इसी तकनीक से महाराज पाण्डु की अनुमति से हुआ था | दर असल जब पाण्डु के शाप की जानकारी कुंती को मिली तो अत्यंत उदास महाराज पांडु को कुंती ने दुर्वासा ऋषि और उनके दिए गये मंत्र के बारे में बताया और कहा कि पांडवों का वंश आगे बढ़ाने के लिए इस मन्त्र का इस्तेमाल अनुचित नहीं है | और तब महाराज पाण्डु की अनुमति मिलने पर इसी ब्लूटूथ तकनीक के द्वारा बिना शारीरिक संपर्क किए धर्मराज से युधिष्ठिर, पवन देव से भीम और इंद्र देव से अर्जुन नाम के तीन पुत्रों की प्राप्ति की | जब सहपत्नी माद्री ने संतान होने का रहस्य पूछा तब कुंती ने माद्री को भी उस यंत्र का उपयोग करना सिखाया और अश्विनीकुमारों का आह्वान करके नकुल और सहदेव नामक दो पुत्रों का जन्म माद्री के गर्भ से हुआ |

लेखक:

CA मनीष कुमार गुप्ता

पौराणिक इतिहासकार

9810771477

mkg.fca@gmail.com

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