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दिल्ली का प्राचीनतम स्मारक अशोक के शिलालेख

 Manish Kumar Gupta |  16 Oct 2018 6:29 AM GMT

क्या आप जानते हैं कि दिल्ली में सबसे पुराना ऐतिहासिक स्थल कौन सा है, लाल किला, पुराना किला, कुतुब मीनार या किला राय पिथौरा जी, नहीं दोस्तों मैं पिछले 100-200-500-1000 साल पहले की बात नहीं कर रहा हूं मैं आपसे 2300 साल पुरानी बात कर रहा हूं जब पूरे देश में भारत के अब तक के सबसे प्रतापी राजाओं में से एक सम्राट अशोक का शासन था जो की चन्द्रगुप्त मौर्य के वंशज थे | दोस्तों मेरा इस बार का भ्रमण अशोक के लघु शिलालेख दिल्ली के श्रीनिवासपुरी में इस्कॉन मंदिर के पास है जहां पर अरावली पर्वतमाला के एक हिस्से पर यह छोटा सा शिलालेख एक नीची पहाड़ी पर है जिसे लोहे की सरिया से बंद करके सुरक्षित किया गया है साथ में एक सुंदर गार्डन बनाया हुआ है जो इस स्थान को रमणीक बनाने में सहयोग करता है | मेरा आप सभी से निवेदन है कि जब भी समय मिले अपने बच्चों को और भाई बहनों को ऐसे स्थान के बारे में जरूर ले जाएं जो हमारी हिंदू राजशाही का प्रतीक, हिंदुत्व की प्रभुत्व की व्याख्यान है और हिंदुत्व के के पूरे भारतवर्ष पर एकाधिकार की कहानी कहता है |

दोस्तों कलिंग के भीषण युद्ध के बाद सम्राट अशोक ने बुद्ध धर्म ग्रहण कर लिया था और बुद्ध धर्म के विस्तार के लिए उसने देश विदेश में न केवल अपने पुत्र-पुत्री और यात्रियों को भेजा बल्कि देश विदेश के विभिन्न स्थानों पर पत्थरों पर और लोहे की स्तंभों पर बुद्ध की शिक्षाओं को लिखवाया | सौभाग्य से ऐसा ही एक लघु शिलालेख दिल्ली में है और मजे की बात यह है कि दिल्ली के लोग भी इस स्थान से अनजान है | उन्हें नहीं पता है कि इतना ऐतिहासिक स्थल दिल्ली में है जहाँ प्रतिदिन सैकड़ों विदेशी यात्री खासकर बौद्ध देशों से यहां आते हैं जबकि दिल्ली वालों ने इसे अपने पर्यटन स्थलों में स्थान तक नहीं दिया है

सम्राट अशोक के और शिलालेख-अभिलेख आदि की जानकारी इस प्रकार है

मौर्य सम्राट अशोक के इतिहास की सम्पूर्ण जानकारी उसके अभिलेखों से मिलती है। यह माना जाता है कि, अशोक को अभिलेखों की प्रेरणा ईरान के शासक 'डेरियस' से मिली थी। अशोक के लगभग 40 अभिलेख प्राप्त हुए हैं। ये ब्राह्मी, खरोष्ठी और आर्मेइक-ग्रीक लिपियों में लिखे गये हैं।

मौर्यकाल के शिलाओं तथा स्तंभों पर उत्कीर्ण लेखों के अनुशीलन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि अशोक का धम्म व्यावहारिक फलमूलक (अर्थात् फल को दृष्टि में रखने वाला) और अत्यधिक मानवीय था। इस धर्म के प्रचार से अशोक अपने साम्राज्य के लोगों में तथा बाहर अच्छे जीवन के आदर्श को चरितार्थ करना चाहता था। इसके लिए उसने जहाँ कुछ बातें लाकर बौद्ध धर्म में सुधार किया वहाँ लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए विवश नहीं किया। वस्तुतः उसने अपने शासनकाल में निरन्तर यह प्रयास किया कि प्रजा के सभी वर्गों और सम्प्रदायों के बीच सहमति का आधार ढूंढा जाए और सामान्य आधार के अनुसार नीति अपनाई जाए।

अशोक के चतुर्दश-शिलालेख या मुख्य शिलालेख निम्नलिखित स्थानों पर पाए जाते है :

गिरनार : सौराष्ट्र, गुजरात राज्य में जूनागढ़ के पास। इसी चट्टान पर शक महाक्षत्रप रुद्रदामन ने लगभग 150 ई. में संस्कृत भाषा में एक लेख खुदवाया। बाद में गुप्त-सम्राट स्कंदगुप्त (455-67 ई.) ने भी यहाँ एक लेख अंकित करवाया। चंद्रगुप्त मौर्य ने यहाँ 'सुदर्शन' नाम के एक सरोवर का निर्माण करवाया था। रुद्रदामन तथा स्कंदगुप्त के लेखों में इसी सुर्दशन सरोवर के पुनर्निर्माण की चर्चा है।

कालसी : देहरादून ज़िला, उत्तराखंड।

सोपारा : (प्राचीन सूप्पारक) ठाणे ज़िला, महाराष्ट्र। यहाँ से अशोक के शिलालेख के कुछ टुकड़े ही मिले हैं, जो मुंबई के प्रिन्स आफ वेल्स संग्रहालय में रखे हुए हैं।

येर्रागुडी : कर्नूल ज़िला, आंध्र प्रदेश।

धौली : पुरी ज़िला, उड़ीसा।

जौगड़ : गंजाम ज़िला, उड़ीसा।

लघु-शिलालेख निम्न स्थानों पर पाए गए हैं:

बैराट : राजस्थान के जयपुर ज़िले में। यह शिलाफलक कलकत्ता संग्रहालय में है।

रूपनाथ: जबलपुर ज़िला, मध्य प्रदेश।

मस्की : रायचूर ज़िला, कर्नाटक।

गुजर्रा : दतिया ज़िला, मध्य प्रदेश।

राजुलमंडगिरि : बल्लारी ज़िला, कर्नाटक।

सहसराम : शाहाबाद ज़िला, बिहार।

गाधीमठ : रायचूर ज़िला, कर्नाटक।

पल्किगुंडु : गवीमट के पास, रायचूर, कर्नाटक।

ब्रह्मगिरि : चित्रदुर्ग ज़िला, कर्नाटक।

सिद्धपुर : चित्रदुर्ग ज़िला, कर्नाटक।

जटिंगा रामेश्वर : चित्रदुर्ग ज़िला, कर्नाटक।

येर्रागुडी : कर्नूल ज़िला, आंध्र प्रदेश।

दिल्ली : अमर कॉलोनी, दिल्ली।

अहरौरा : मिर्ज़ापुर ज़िला, उत्तर प्रदेश

आपका अपना :

CA. मनीष कुमार गुप्ता

पौराणिक इतिहासकार

9810771477

mkg.fca@gmail.com

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