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शौर्य और बलिदान की गाथा : दिल्ली का राष्ट्रीय पुलिस स्मारक

 Manish Kumar Gupta |  2018-11-26T15:05:32+05:30

आज हम जिस सुकून के इस देश में सबके साथ रहते हैं उस सब के पीछे लाखों पुलिस और अर्धसैनिक बलों का कानून व्यवस्था को सँभालने और आंतरिक सुरक्षा का दायित्व ही तो है जिसे वो जिम्मेदारी से निभाते हैं | जिस तरह सेना के जवान सीमा पर देश की रक्षा करते हैं उसी तरह पुलिस और अर्धसैनिक बल देश की आंतरिक सुरक्षा में लीन रहते हैं | देश की सीमा पर तैनात सैनिकों के शहादत का जज्बा तो हमारे रोम-रोम में है लेकिन उन पुलिस वालों का जज्बा भी किसी से कम नहीं होता जो देश के अंदर ही असामाजिक तत्वों से लड़ते हुए अपनी जान देश के लिए कुर्बान कर देते हैं यह अलग बात है कि पुलिस के बलिदान की गाथा कहने वाले लोग कम हैं |

ऐसे भूले बिसरे पुलिसकर्मियों को श्रद्धांजलि देने का एक महान कार्य हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद मोदी जी ने किया है और इन्हीं हुतात्मायों की याद में दिल्ली के कौटिल्य मार्ग पर एक भव्य राष्ट्रीय पुलिस स्मारक (#National_Police_Memorial) का देश को समर्पण 21 अक्तूबर 2018 किया |

मुख्य स्मारक के तौर पर ग्रेनाइट के एक टुकड़े से बनी केंद्र में पत्थर की प्रतिमा है जिससे 30 फीट ऊँचा पत्थर का खंभे नुमा स्मारक बनाया गया है, इसका वजन 238 टन है और गहरा काला रंग बलिदान का प्रतीक है। इस स्मारक में बनी उलटी खड़ी बंदूक और पुलिस हेलमेट शांति, सुरक्षा और शौर्य का प्रतीक है | उसके नीचे गीता का श्लोक कह रहा है कि आत्मा अजर अमर है | इसके साथ ही एक भूमिगत पुलिस संग्रहालय भी बना है जो काफी बड़ा है और स्मारक के एक छोर से घुसकर दूसरे छोर पर निकलता है |

इस संग्रहालय में वे कलाकृतियां एवं समय-बिन्दु शामिल हैं जिन्होंने भारतीय पुलिस के इतिहास को आकार दिया है। यह अद्वितीय संग्रहालय इतिहास, कलाकृतियों, वर्दी और केंद्रीय और राज्य पुलिस बलों और अर्धसैनिक बलों, जैसे CISF, CRPF, BSF, PAC, SPG, NSG, Cobra, GRPF, RPF, MARCOS, Para military आदि के उपकरणों को दर्शाते हुए राष्ट्रीय पुलिस स्मारक के परिसर में एक भूमिगत हॉल में बनाया गया है जो हमें रहस्य और रोमांच की उस दुनिया में ले जाता है जहां प्राचीन काल से आधुनिक काल तक पुलिस, अपराध और अपराधियों से संबंधित जागरुकता पैदा करने वाली अनेक वस्तुएं मौजूद हैं। हॉल में घुसते ही गैलरी में दोनों तरफ बड़े-बड़े चित्र लगाए गए हैं जो पुलिसिंग व्यवस्था के प्राचीन इतिहास को बताते हैं | रामायण काल से लेकर हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की पुलिस व्यवस्था और दंड संहिता से लेकर गुप्त वंश, कौटिल्य के बारे में बताते हुए आगे मुग़ल शासन के बाद अंग्रेजी शासन में पुलिस व्यवस्था कैसे काम करती थी इसमें बताया गया है |

एक लम्बे हॉल में पुलिस की विभिन्न रैंक्स की करीब 15 / 20 मूर्तियां लगाई गई है इसमें उनकी कैप, बेल्ट, हथियार, वर्दी के रंग, उनके चिन्ह क्या होते है आदि दिखाए गए हैं | इसके बाद हथियारों की दीर्घा में पुलिस द्वारा इस्तेमाल करने वाले विभिन्न प्रकार के हथियार जैसे राइफले , पिस्टल, रिवॉल्वर से लेकर कार्बाइन, ऑटोमैटिक गन आदि हथियार रखे गए है | यहाँ पर एक ई-श्रद्धांजलि का सेक्शन भी बनाया गया हैं जहाँ पर आप इलैक्टोनिक तरीके से कंप्यूटर के द्वारा बलिदानी जवानों को श्रद्धांजलि दे सकते हैं। महिला पुलिस का भी एक अलग सेक्शन है | इस स्मारक का निर्माण शांतिपथ के उत्तरी छोर पर चाण्क्यपुरी में 6.12 एकड़ भूमि पर किया गया है।

आजादी के बाद से आज तक के विभिन्न राज्यों के सभी पुलिस बल, अर्धसैनिक बल आदि के अब तक ड्यूटी पर कुल 34,844 पुलिस जवान शहीद हुए जिन्होंने आतंकवाद को रोकने और कानून व्यवस्था को बनाना में अपना जीवन बलिदान कर दिया | इन सभी शूरवीर बलिदानियों के नाम काळा ग्रेनाइट के शिलापत्तों पर उकेरे गए हैं ।

राष्ट्रीय पुलिस स्मारक के साथ बना संग्रहालय देश का एकमात्र ऐसा संग्रहालय है जो अर्धसैनिक बलों और सभी राज्यों की पुलिस का सम्मिलित एक राष्ट्रीय स्तर का स्थायी प्लेटफॉर्म हैं। इस संग्रहालय में केंद्रीय और राज्य पुलिस बलों का इतिहास जानने का मौका मिलेगा। इससे पुलिस से जुड़े विषयों पर शोध करने वालों को मदद मिलेगी। साथ ही जो युवा पुलिस में भर्ती होना चाहते हैं वो इस स्थान को एक बार जरूर देखें | आपको ज्ञान के अलावा प्रेरणा भी मिलेगी बच्चों और सामान्यजनों को भी इस विषय पर काफी ज्ञान मिलेगा | सभी सशस्त्र पुलिस बल, केंद्रीय पुलिस संगठन और राज्य पुलिस बलों ने अपने ऐतिहासिक दस्तावेज, सामग्री, पुलिस संबंधी गजट अधिसूचना, अनूठे हथियार और वर्दी को यहाँ संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है और लगातार जारी है |

अमृतसर बाघा बॉडर की तरह दर्शनीय पुलिस के जवानों की परेड का आयोजन प्रत्येक शनिवार और रविवार को यहाँ 5 बजे से 6 बजे तक होता हैं | यहाँ जाने के लिए आपको तीन मूर्ति भवन से आगे कौटिल्य मार्ग पर जाना होगा और वहां से पंडित उमाशंकर दीक्षित मार्ग पर जाकर मुख्या दरवाजा अंदर जाकर है | पार्किंग के लिए विशाल स्थान है | मुख्य स्मारक को कभी भी देख सकते हैं जबकि भूमिगत संग्रहालय का समय सुबह दस बजे से लेकर शाम पांच बजे तक है | रात को यहाँ सुन्दर रोशनी की व्यवस्था की गई हैं | यहां फोटोग्राफी की जा सकती है। संग्रहालय पूर्णतया निशुल्क है।

आने वाले समय में ये स्थान इंडिया गेट और लालकिले की तरह एक राष्ट्रीय व् अन्य त्यौहारों पर एकजुटता का केंद्र बन जायेगा | जैसे इंडिया गेट पर हर त्यौहार पर भीड़ लगी रहती है उसी तरह आने वाले समय में ये स्थान भी प्रसिद्ध हो जायेगा | प्रत्येक बलिदानी पुलिसकर्मी के नाम पत्थर पर सदा- सदा के लिए अंकित कर देने के इस कार्य को राष्ट्रीय पुलिस स्मारक में किया गया है शौर्य और बलिदान की ये अमर कहानियां आपको कोई और नहीं सुनाएगा ऐसा मेरा विश्वास है।

यहाँ आपको पुलिस के जज्बे और बहादुरी की वो दास्ताँ मिलेंगी जिसे सुनकर आपके रोंगटे खड़े हो उठेंगे और आपके मन में गर्व वीरता, त्याग और बलिदान के संकल्प की भावना जग उठेगी, मन में शौर्य और भावनाओं के तूफान उठेंगे | स्कूल और कॉलेज के ट्रिप यहाँ अवश्य होने चाहिए और सभी माता पिता अपने बच्चों को लेकर जाएँ ताकि उन्हें भी राष्ट्रभक्ति की भावना मिले |

आपका अपना

इतिहासकार

CA. मनीष कुमार गुप्ता

9810771477, 9810247266

mkg.fca@gmail.com

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Manish Kumar Gupta ( 29 )

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