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चरखा संग्रहालय दिल्ली

 Manish Kumar Gupta |  21 Jan 2019 6:38 AM GMT

देश को आजाद हुए 71 साल हो गए हैं लेकिन आजादी के दीवानों को आज भी स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी हर याद गौरवान्वित करती है आजादी के वह तीन प्रतीक जिन्होंने क्रांति की अलख जगा दी थी आज भी जन सामान्य के बीच श्रद्धा के पात्र हैं वह तीन प्रतीक थे, रोटी, चरखा और कमल का फूल | उन दिनों आज की तरह संदेश के साथ साधन इतने अच्छे नहीं थे इसलिए क्रांति के प्रतीक बनाये गए जैसे रोटी को देना या लेना क्रांति का संदेश लेने देने के साथ होता था | कमल का फूल पहुंचाना यानी क्रांति की ज्वाला जगाने की सूचना था और चरखा चलाने वाले का अर्थ यह था कि आजादी की लड़ाई वह भी साथ हैं |

आज मैं आज़ादी के एक प्रतीक अर्थात गाँधी जी के अहिंसा और असहयोग आंदोलन के हथियार चरखा और चरखा के नए नवेले म्यूजियम के बारे में बताता हूँ जो एक वर्ष पूर्व दिल्ली के कनॉट प्लेस में बनाया गया और 21 मई 2017 को इसका शुभारंभ भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष श्री अमित शाह जी, अध्यक्ष, भारतीय जनता पार्टी द्वारा किया गया था |

दर्शकों के लिए यहाँ पर दुनिया का सबसे ऊंचा स्टील का चरखा भी बनाया गया है । इस स्टील के चरखे और म्यूजियम को पालिका बाजार की पार्किंग के ऊपर तैयार किया गया है। पार्किंग के ऊपर बने पार्क को भी नए फूलों से सजाया गया है। पार्क में कई जगहों पर फूलों और हरियाली से सजाया गया है। गांधी जी के तीन बंदरों की मूर्तिया भी यहाँ लगी है और Make in India का स्टील का शेर भी यहां बनाया गया है। साथ में महात्मा गाँधी का एक आदमकद 3D भित्ति चित्र भी बनाया गया है ।

संग्रहालय के अंदर एक प्रोजेक्टर पर चरखे की कहानी भी दिखाई जाती है | स्थान के लिहाज से तो यह एक बिलकुल छोटा सा म्यूजियम है लेकिन सैंकड़ों सालों की विरासत और आजादी की बेला की खुशबू अपने अंदर समेटे हुए है ।

यहाँ प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी सहित देश-दुनिया की कई महान हस्तियों के संदेश भी म्यूजियम में लगे हुए हैं। आजादी की लड़ाई के समय पर देश में भांति भांति के प्रकार के चरखे क्रांति की ज्वाला जलाए रखने में इस्तेमाल हो रहे थे | ऐसे कई चरखों को एकत्र कर दिल्ली के चरखा संग्रहालय में रखा गया जहाँ बताया जाता है कि कैसे चरखे ने क्रांति की ज्वाला जलाने में अपना भरपूर सहयोग दिया | देश-दुनिया से आने वाले हज़ारों पर्यटक इस चरखा म्यूजियम को देखने आते हैं । संग्रहालय का शुल्क मात्र 20 रूपए है । टिकट के साथ एक गिफ्ट भी मिलता है और बच्चों का शुल्क नहीं है | यहाँ गाड़ी के पार्किंग की भी अच्छी व्यवस्था है

आइये अब जानते हैं कि आखिर चरखा क्या है तो यूं समझें दरअसल चरखा एक ऐसी हस्तचालित युक्ति है जिससे कपास से सूत के धागे तैयार किय जाते हैं और उसी सूत से कड़ी के वस्त्र बनते हैं। इसका उपयोग कुटीर उद्योग के रूप में सूत उत्पादन में किया जाता है। अंग्रेज़ों के भारत आने से पहले भारत भर में चरखे और करघे का खूब प्रचलन था |

सन 1908 की बात है जब गाँधी जी के मन में चरखे का विचार आया और उन्होंने चरखा को अपने स्वतंत्रता संग्राम में अपना हथियार बनाने का फैसला कर लिया | उनके अनुसार चरखा त्याग, स्वदेशी और क्रांति का प्रतीक था | दरअसल गाँधी जी के चरखे और खादी के पीछे सेवा का भाव, वैकल्पिक आर्थिक व्यवस्था, कुटीर उधोगों व महिलाओं की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए आवश्यक था | उनके लिए चरखा आर्थिक स्वतंत्रता का वाहक और बेरोज़गार किसान के लिए रोज़गार और शहर को गांव से जोड़ने का जरिया था इसलिए वह हर व्यक्ति को चरखा चलाने के लिए प्रेरित करते थे | गांधी जी ने सत्याग्रह, चरखा और खादी के माध्यम से सर्व सामान्य जनता को स्वतंत्रता आंदोलन में भागी होने का एक सरल एवं सहज तरीका साधन उपलब्ध कराया और इससे लाखों की संख्या में लोग स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए ।

इसी चरखे को हमारे तिरंगे झंडे में भी स्थान मिला था | यह अलग बात है कि बाद में उसके स्थान पर अशोक चक्र को ले लिया गया | गाँधी जी के लिए चरखा अहिंसा, स्वराज्य और एकता की ताकत थी और आर्थिक बदलाव का मजबूत औज़ार था। अगर आज आपको भी उस करामती चरखे की तलाश है तो आपको इसके लिए गांधी जी के विज़न वाली सोच रखनी होगी उनके चरखा-दर्शन को ज़िंदगी में उतारना पड़ेगा।

चरखा म्यूजियम एक शानदार जगह है जो न केवल हर देशभक्त को देखनी चाहिए बल्कि अपने बच्चों व परिवार के साथ जरूर जाना चाहिए ताकि वो लोग भी आजादी कि कहानी को नज़दीक से जान सकें और आजादी को महसूस कर सकें |

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