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बाबा बघेल सिंह मल्टीमीडिया म्यूजियम

 Manish Kumar Gupta |  2019-01-22T12:13:22+05:30

आज आपको एक सिक्खी शन के प्रतीक दिल्ली के ऐसे स्थान पर लेकर चलते हैं जहां जाकर आपको गर्व और प्रसन्नता का अनुभव होगा लेकिन अफसोस यह स्थान जनता की नज़रों से अनजान है और जिसका नाम है बाबा बघेल सिंह मल्टीमीडिया म्यूजियम।

गुरुद्वारा बंगला साहिब स्थित दिल्ली का यह बाबा बघेल सिंह म्यूजियम बाबा बघेल सिंह की बहादुरी की दास्तान सुनाता है इनकी याद में बनाए गया म्यूजियम देसी और अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों को सिख धर्म की विस्तृत जानकारी प्रदान करने का एक शानदार स्थान भी बन गया है।

क्या आप जानते हैं सिक्खों के एक शानदार लड़ाके बाबा बघेल सिंह ने मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय को हराकर दिल्ली के लालकिले पर कब्जा कर लिया था और न केवल केसरिया झंडा लाल किले पर फहरा दिया था बल्कि उसकी छाती पर चढ़ कर सिक्खों के लिए दिल्ली में गुरुद्वारे बनवाने के लिए उसके हलक से पैसे भी निकाले। यह हमारे देश का दुर्भाग्य ही तो था कि इतिहास लिखने वालों ने बहुत ही भेदभाव किया और हिंदुओं के सम्मान और वीरता के सभी चिन्ह और कहानियां उन्होंने मिटा कर रख दिए। व्यक्तिगत लाभ न देखकर सिर्फ धर्म के सम्मान के लिए युद्ध लड़ने की और सिक्खों की बहादुरी की इस अनोखी घटना को हम हिंदुस्तानी लोगों को जाननी और याद रखनी होगी जो हमारे इतिहास में जानबूझकर शामिल नहीं की गई।

बाबा बघेल सिंह :

इतिहास गवाह है कि दिल्ली के लाल किले पर हमेशा मुस्लिम शासकों ने राज किया था लेकिन सन 1783 में ऐसा पहली बार हुआ जब सिख सेना ने मुगल बादशाह शाह आलम को घुटनों पर ला दिया और लाल किले पर केसरी निशान साहिब (झंडा) लहराया था | बाबा बघेल सिंह का जन्म अमृतसर जिले के गांव झब्बल में 1730 में हुआ था। महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल से पहले पंजाब में 12 सिख मिसलें थीं। इन्हीं में से एक मिसल (रियासत) की नींव करोड़ सिंह ने रखी थी। करोड़ सिंह का गांव का नाम पंजगढिय़ा था इसलिए सिख इतिहास में इस को पंजगढिय़ा मिसल के नाम से भी जाना जाता है। बाबा बघेल सिंह इस मिसल के प्रसिद्ध जरनैल थे। बाबा बघेल सिंह ने अपने अभूतपूर्व युद्ध कौशल व वीरता के कारण कुछ ही समय में भुंगा, नवांशहर व रुड़कां को जीतकर अपनी मिसल के अधिकार क्षेत्र में शामिल कर लिया था। इसके बाद दरिया मरकंडा व यमुना नदी के बीच (वर्तमान हरियाणा प्रदेश) के बहुत से इलाके भी इस मिसल के अधीन आते ही बाबा बघेल सिंह ने करनाल व जगाधरी के बीच वलौंधी को अपनी राजधानी बना लिया था। बाबा बघेल सिंह ने अफगानी लुटेरे अहमद शाह अब्दाली को पंजाब में घायल कर दिया था और उसके चुंगल से हजारों बंदी बनाई गई महिलाओं को छुड़वाकर उसके कारवां को भी लूटा था। इतिहास के जानकारों के अनुसार बाबा बघेल सिंह की सेना में उस समय 12 हजार से भी अधिक घुड़सवार सैनिक शामिल थे।

औरंगज़ेब के जमाने से मुगलों ने हिन्दुओं और सिखों का धर्म परिवर्तन करने की जैसे ठानी हुई थी। सिखों के बहादुर योद्धा बाबा बंदा सिंह बहादुर को 740 सिखों के साथ शहीद करने का फरमान सुनाया गया था | हजारों महिलाओं के साथ बलात्कार किया और तमाम हिन्दुओं और सिक्खों को मार डाला गया | धर्म परिवर्तन ना करने पर दिल्ली में कई सिख गुरुओं और उनके परिवारों पर ज़ुल्म ढाये और उन को शहीद किया गया था, लेकिन उन जगहों पर न तो कोई गुरुद्वारा बनाने दिया और न ही सिखों को वहां पूजा का अधिकार दिया गया था |

सरदार बघेल सिंह की सिख गुरुओं में अपार आस्था थी। उनके साथ समूचा सिख समाज इन बातों से उद्वेलित था। तब बाबा बघेल सिंह की अगुवाई में जत्थेदार जस्सा सिंह आहलुवालिया और जत्थेदार जस्सा सिंह रामगढ़िया ने मुगलों पर आक्रमण कर दिया और इनका निशाना दिल्ली था और इसके लिए बाबा बघेल सिंह,जस्सासिंह आहलुवालिया और जस्सा सिंह रामगढ़िया ने मिलकर एक रणनीति बनाई | यूं तो यह तीनों अलग-अलग क्षेत्र से थे इसलिए तीन रास्तों से आकर यह तीनों एक हो गए और इनकी सेना ने यमुना तक अपने पांव फैला लिए दिल्ली के लाल किले पर कब्जा करने से पहले बाबा बघेल सिंह और जस्सा सिंह आहलुवालिया ने गंगा-यमुना के बीच के कई क्षेत्रों जैसे अलीगढ़, टुंडला, हाथरस, खुर्जा और शेखूबाद आदि पर आक्रमण कर उनसे लगान वसूला और वसूले गए धन में से कुछ राशि श्री दरबार साहिब, अमृतसर के निर्माण के लिए भेज दी इसके बाद सिख सेना ने 12 अप्रैल 1781 को यमुना पार की और दिल्ली से 32 मील दूर बागपत पर आक्रमण कर दिया | इसके बाद विजयी अभियान को जारी रखते हुए उन्होंने 16 अप्रैल को शाहदरा और फिर पड़पड़गंज पर हमला बोल दिया |

8 अप्रैल 1783 को बाबा बघेल सिंह, जस्सा सिंह आहलुवालिया और जस्सा सिंह रामगढ़िया की अगुवाई में 40 हजार सैनिक बुराड़ी घाट पार कर दिल्ली में दाखिल हुए | आहलुवालिया के निर्देश पर सेना को तीन हिस्सों में विभाजित किया गया | 5 हजार सिपाही मजनूं के टीले पर तैनात कर दिए गए | 5 हजार सिपाहियों की दूसरी टुकड़ी अजमेरी गेट पर तैनात की गई और बाकी बची 30 हजार की सेना, जिसमें अधिकतर घुड़सवार थे, को सब्जी मंडी व कश्मीरी गेट के बीच के स्थान पर खड़ा कर दिया गया | जिसे आजकल तीस हजारी के नाम से जाना जाता है। तीस हजारी को यह नाम लाल किले पर आक्रमण करने वाले 30 हजार सिख सैनिकों के कारण दिया गया था, जो नंगी तलवार लेकर मुगलों का काम तमाम करने के लिए वहां तैनात थे। सिख सरदार बघेल सिंह के नेतृत्व में तीस हजारी मैदान का पड़ाव एक मील का पत्थर माना जाना जाता है। सिख सेना की दिल्ली में होने की खबर सुनकर बादशाह शाह आलम घबरा गया और उसने मिर्जा शिकोह के नेतृत्व में महताबपुर किले पर सिख सेना को रोकने की कोशिश की | हालांकि वहां पर पराजित होकर वह भाग गया और लाल किले में जाकर छिप गया | फजल अली खां ने भी सिखों को रोकने का असफल प्रयास किया | इसके बाद 'वाहे गुरुजी का खालसा, वाहे गुरुजी की फतेह' के उद्घोष के साथ सिख सेना लाल किले की ओर बढ़ी और दूसरी तरफ अजमेरी गेट पर तैनात सिख सेना ने शहर पर आक्रमण कर दिया | मुगल सेना युद्ध करने की बजाय छिप गई | यह सेना बाद में मल्कागंज, मुगलपुरा और सब्जी मंडी में फैल गई 11 मार्च को सिख सेना लाहौरी गेट और मीना बाजार को पार करती हुई लाल किले के दीवान-ए-आम पहुंच गई और वहां कब्जा कर लिया |

दीवान-ए-आम पर कब्जा करने के बाद सिख सेना ने लाल किले के मुख्य द्वार पर खालसा पंथ का केसरी निशान साहिब (झंडा) फहराया | ऐसा इतिहास में पहली बार हुआ था, जब सिख सेना ने लाल किले पर कब्जा किया था | जब शाह आलम ने देखा कि सिखों ने दीवान-ए-आम पर कब्जा कर लिया है तो वह अपने वकील रामदयाल और चांदनी चौक के समरू हवेली (वर्तमान में भगीरथ पैलेस) की मालकिन बेगम समरू के साथ अपने जीवन की भीख मांगने लगा| बेगम समरू (सरधना के रानी) बेहद मंझी हुई राजनीतिज्ञ थी, इसलिए उसने तुरंत ही तीनों जरनैलों को अपना भाई बना लिया और दो मांगें उनके सामने रख दीं | पहली शाहआलम का जीवन बख्श दिया जाए और दूसरा लाल किला उसके कब्जे में रहने दिया जाए |

वह सभी स्थान जहां गुरु साहिबान के चरण पड़े, जहां गुरु तेग बहादुर साहिब को शहीद किया गया और माता सुंदरी व माता साहिब कौर जी के निवास स्थानों का अधिकार सिखों को दिया जाए | बादशाह शाह आलम को कहा गया कि वह सात स्थानों पर गुरुद्वारा साहिबान के निर्माण के आदेश जारी करे गुरुद्वारों के निर्माण तथा अन्य खर्चों की पूर्ति के लिए कर की वसूली में से छह आने प्रति रुपया उन्हें दिया जाए और जब तक गुरुद्वारों का निर्माण पूरा नहीं हो जाता, तब तक 4 हजार सिख सैनिक दिल्ली में ही रहेंगे | इसी के साथ बाबा बघेल सिंह गुरुद्वारों के निर्माण के लिए दिल्ली में ही रुके रहे वहीं, जस्सा सिंह आहलुवालिया व जस्सा सिंह रामगढ़िया दीवान-ए-आम का 6 फुट लंबा, 4 फुट चौड़ा और 9 इंच मोटा पत्थर का तख्त उखाड़कर घोड़े के पीछे बांधकर अपने साथ अमृतसर ले गए यह तख्त आज भी दरबार सिंह, अमृतसर के नजदीक बने रामगढ़िया बुर्ज में रखा हुआ है यह बघेल सिंह की वीरता ही थी जिसके आगे झुकते हुए मुगल शहंशाह को गुरुद्वारों के निर्माण के लिए तीन लाख का नजराना देना पड़ा। इतना ही नहीं उन्होंने दिल्ली में दो साल रहकर गुरूद्वारे बनवाए। उसके बाद बाबा होशियारपुर-दसूहा मार्ग पर स्थित कस्बा हरियाने (वर्तमान पंजाब में स्थित) में चले गए जहाँ महान जरनैल बाबा बघेल सिंह व उनकी पत्नी का समाधि स्थल है हैरानी वाली बात है कि आज की बहुसंख्यक युवा पीढ़ी को अपनी इस गौरवशाली अनमोल धरोहर के संबंध में ज्यादा जानकारी तक नहीं है।

आज दिल्ली में जितने भी प्राचीन गुरुद्वारे हैं सभी उन्हीं के बनवाए हुए हैं। इस तरह, बघेल सिंह ने न केवल शाह आलम को घुटनों पर ला दिया बल्कि अपनी शर्तों पर दिल्ली में सिखों के ऐतिहासिक गुरूद्वारों के निर्माण की आज्ञा का फरमान हासिल किया बल्कि राजधानी में गुरूद्वारों के निर्माण के लिए सिख सेना के चार साल रहने और उसके खर्च को भी मुगलों से वसूला। उन्होंने दिल्ली में सात ऐतिहासिक सिख धार्मिक स्थलों का निर्माण किया जिनमें माता सुंदरी गुरुद्वारा, बंगला साहिब, बाला साहिब, रकाबगंज, शीशगंज, मोतीबाग, मजनू का टीला और दमदमा साहिब शामिल है। ऐसे शूरवीर और महाबली बाबा बघेल सिंह की याद में दिल्ली के प्रसिद्ध अशोक रोड पर स्थित गुरुद्वारा बंगला साहिब में एक शानदार म्यूजियम का निर्माण हुआ है यह दिल्ली का एक ऐसा पर्यटन स्थल है जिसके बारे में हम लोग नहीं जानते जबकि दिल्ली से बाहर के लोग देखने आते हैं |

अगर आपने यह स्थान नहीं देखा तो यकीन मानिये आपने एक बेहद शानदार इतिहास को अनछुए छोड़ दिया है | इस म्यूजियम में पेंटिंग डिजिटल टेक्नोलॉजी, स्क्रीन, भित्तिचित्र, चित्रपट, तथा विभिन्न भाषाओं के माध्यम से सिख धर्म के मूल सिद्धांतों की जानकारी प्रदान की जाती है | इस संग्रहालय में 250 पेंटिंग से सज्जित चार गैलरियों तथा 170 लोगों की क्षमता का एक छोटा आडिटोरियम है | इस संग्रहालय में सिख गुरुओं तथा सिख योद्धाओं के दर्शनशास्त्र तथा उपदेशों पर आधारित पांच मिनट की फिल्म भी दिखाई जाती है | यह गुरुद्वारा बंगला साहिब के अंदर है जो कि सिक्खों का एक प्रमुख आकर्षक गुरुद्वारा है और अपने स्वर्ण मंडित गुम्बद शिखर के कारण प्रसिद्ध है। गुरुद्वारा बंगला साहिब मूलतः एक बंगला था जो जयपुर के महाराजा जयसिंह का था। सिखों के आठवें गुरु हर किशन सिंह यहां अपने दिल्ली प्रवास के दौरान रहे थे। उस समय स्माल पॉक्स और हैजा की बिमारियां फैली हुई थीं। गुरु महाराज होशियारपुर से दिल्ली छोटी माता के प्रकोप से दिल्ली वासियों को बचाने आए थे। उन्होंने उन बीमारियों के मरीजों को यहां से जल और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराईं थीं। अब यह जल स्वास्थ्य वर्धक, आरोग्य वर्धक और पवित्र माना जाता है और विश्व भर के सिखों द्वारा ले जाया जाता है। यह गुरुद्वारा अब सिखों और हिन्दुओं के लिए एक पवित्र तीर्थ है। बाद में राजा जय सिंह ने इसी कुएँ पर एक तालाब का निर्माण कराया और उनकी याद में गुरुद्वारा बनवाया |

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