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पुष्कर: एक धार्मिक व पर्यटन स्थल

 Manish Kumar Gupta |  27 March 2019 8:10 AM GMT

पुष्कर भारत के सबसे प्राचीन शहरों में से एक है। सागरतल से 2389 फुट की ऊँचाई में स्थित राजस्थान के अजमेर जिले में अरावली रेंज के बीच, पुष्कर को तीर्थ-राज कहा जाता है, जिसका अर्थ है, तीर्थोंस्थलों का राजा | यह हिंदू धर्म धर्मावलम्बियों के लिए पांच प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है। पुष्कर में कई मंदिर हैं और सबसे प्रसिद्ध मंदिर ब्रह्मा मंदिर है, जो कि दुनिया में ब्रह्मा जी को समर्पित कुछ मंदिरों में से एक है और पूरे भारत में केवल एक यही ब्रह्माजी का मन्दिर है। इस मन्दिर का निर्माण ग्वालियर के महाजन गोकुल प्राक् ने अजमेर के निकट करवाया था। ब्रह्मा मन्दिर की लाट लाल रंग की है तथा इसमें ब्रह्मा के वाहन हंस की आकृतियाँ हैं। चतुर्मुखी ब्रह्मा और उनकी पत्नियों देवी गायत्री तथा सावित्री यहाँ मूर्तिरूप में विद्यमान हैं। पुष्कर में एक प्रसिद्ध झील है जिसमें 52 घाट हैं। पूरे देश से तीर्थयात्री इस झील के पवित्र जल में डुबकी लेने के लिए आते है| पुष्कर का पहाड़ करीब 11 किमी. लम्बाई में है यह पहाड अनेक ऋषी मुनियों की तपोस्थली रहा है इसमें मह्रिषी अगस्त एवं वाम देव की गुफा भी है इसी नाग पहाड पर राजा भर्तहरि की तपोस्थली भी है, इस पहाड के उपर से एक तरफ अजमेर तो दूसरी तरफ पुष्कर है। पवित्र पुष्कर झील अपने किनारे पर स्थित 400 नीले रंग के मंदिरों से मंत्र और भजनों के साथ झूमता है।

पुष्कर का नामकरण और वज्रनाभ का वध: संस्कृत में पुष्कर का अर्थ है नीले कमल का फूल | पौराणिक दृष्टि से पुष्कर का एक दिलचस्प और रहस्यमय इतिहास है | किंवदंतियों के अनुसार, ब्रह्मा ने सृष्टि के निर्माण बनाने के लिए पुष्कर का चयन किया । इनका उल्लेख पद्मपुराण में मिलता है। पद्मपुराण के सृष्टि खंड में लिखा है कि वज्रनाभ नामक एक राक्षस ब्रह्माजी के पुत्रों का वध कर दिया था। तब ब्रह्माजी ने क्रोधित हो कर नीले कमल का प्रहार कर इस राक्षस को मार डाला जिससे स्थान का नाम पुष्कर पड़ा | पुष्कर की तीन जगहों पर कमल के कुछ हिस्सों गिर गये और इन जगहों को बाद में य्याष्ठा, मध्य और कनिष्ठ पुष्कर कहा गया। ज्येष्ठ पुष्कर के देवता ब्रह्मा, मध्य के विष्णु व कनिष्ठ के देवता शिव हैं। मुख्य पुष्कर ज्येष्ठ पुष्कर है और कनिष्ठ पुष्कर बूढ़ा पुष्कर के नाम से विख्यात हैं, जिसका हाल ही जीर्णोद्धार कराया गया है। पुष्कर के नामकरण के बारे में कहा जाता है कि ब्रह्माजी के हाथों (कर) से पुष्प गिरने के कारण यह स्थान पुष्कर कहलाया।

माता सावित्री का परमपिता ब्रह्माजी से रूठ जाना: वज्रनाभ का वध करने के बाद ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना के लिए पुष्कर में कार्तिक एकादशी पर यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया एवं जिसकी पूर्णाहुति पूर्णिमा के दिन हुई। उसी की स्मृति में यहाँ कार्तिक माह एकादशी से पूर्णिमा तक मेला लगने लगा। पद्म पुराण के अनुसार यज्ञ को निर्विघ्न पूरा करने के लिए ब्रह्माजी ने दक्षिण दिशा में रत्नागिरी, उत्तर में नीलगिरी, पश्चिम में सोनाचूड़ और पूर्व दिशा में सर्पगिरी (नाग पहाड़) नामक पहाड़ियाँ बनाई थीं। कहते हैं कि यज्ञ शुरू करने से पहले ब्रह्माजी ने अपनी पत्नी सावित्री को बुला कर लाने के लिए अपने पुत्र नारद से कहा। नारद के कहने पर जब सावित्री रवाना होने लगी तो नारद ने उनको देव-ऋषियों की पत्नियों को भी साथ ले जाने की सलाह दी। इस कारण सावित्री को विलंब हो गया। यज्ञ के नियमों के तहत पत्नी की उपस्थिति ज़रूरी थी और पूजा का शुभ मुहूर्त निकला जा रहा था । सभी देवी-देवता एक-एक करके यज्ञ स्थली पर पहुंचते गए, लेकिन सावित्री का कोई अता-पता न था। कहते हैं कि जब शुभ मुहूर्त निकलने लगा, तब कोई उपाय न देखकर इन्द्र ने एक गुर्जर कन्या को तलाश कर गाय के मुंह में डाल कर पीठ से निकाल कर पवित्र किया और उसका ब्रह्माजी के साथ विवाह संपन्न हुआ। इसी कारण उसका नाम गायत्री कहलाया। इसलिए परम आराध्या देवी गायत्री का जन्म स्थान भी पुष्कर ही माना जाता है। जैसे ही सावित्री वहाँ पहुँची और ब्रह्माजी को गायत्री के साथ बैठा देखा तो वो क्रोधित हो उठीं और बोली आपने अपनी पत्नी का अपमान किया हैं और अत: आप को शाप देती हूँ कि पुष्कर के अलावा पृथ्वी पर आपका कोई मंदिर नहीं होगा, इन्द्र को शाप दिया कि युद्ध में तुम कभी विजयी नहीं हो पाआगे, ब्राह्मणों को शाप दिया कि तुम सदा दरिद्र रहोगे और कभी संतुष्ट नहीं होंगे। गाय को शाप दिया कि तू कलयुग में गंदी वस्तुओं का सेवन करोगी। नारद को आजीवन कुंवारा रहने का श्राप दिया। अग्निदेव को भी कलियुग में अपमानित होने का शाप दिया। कुबेर को शाप दिया कि तुम धनहीन हो जाओगे। इतना कहकर सावित्री पुष्कर के पास मौजूद पहाड़ियों पर जाकर तपस्या में लीन हो गईं और फिर वहीं की होकर रह गईं। सृष्टि की रचना करने वाले परमपिता ब्रह्मा की एक गलती के कारण उनकी पत्नी सावित्री रूठ कर हमेशा के लिए उनका साथ छोड़ गईं यही वजह है कि ब्रह्मा के मंदिर से बिल्कुल अलग-थलग उन्होंने पहाड़ पर अपना बसेरा बनाया हुआ है और आज सृष्टि के रचियता ब्रह्मा को पूजा सिर्फ पुष्कर में ही होती है | यज्ञ की समाप्ति पर सभी के बारम्बार विनय करने पर गायत्री ने सभी को शाप से मुक्ति दिलाई और ब्राह्मणों से कहा कि तुम संसार में पूजनीय रहोगे। इन्द्र से कहा कि तुम हार कर भी स्वर्ग में निवास करोगे।

द्धापर युग में पुष्कर: महाभारत काल की पुष्टि जिनके आधार पर कहा जाता है कि पांडवों ने अपने वनवास काल के कुछ दिन पुष्कर में ही बिताए थे। उन्हीं के नाम पर यहाँ पंचकुंड बना हुआ है। सुभद्रा हरण के बाद अर्जुन ने पुष्कर में कुछ समय विश्राम किया था। महाभारत के वन पर्व के अनुसार श्रीकृष्ण ने पुष्कर में दीर्घकाल तक तपस्या की। ऐसी मान्यता है कि वेदों में वर्णित सरस्वती नदी पुष्कर तीर्थ और इसके आसपास बहती है। महाभारत में गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वथामा को कृष्ण ने तीन हज़ार सालों तक पृथ्वी पर घूमने के लिए शाप दिया था। ऐसा कहा जाता है कि अश्वथामा ने मोक्ष के लिए पाप मोचिनी मंदिर का दौरा किया था।

त्रेता युग में पुष्कर: वाल्मिकी रामायण में भी पुष्कर का उल्लेख है। अयोध्या के राजा त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग में भेजने के लिए अपना सारा तप दांव लगा देने के लिए विश्वामित्र ने यहाँ पर तप किया था। यह उल्लेख भी मिलता है कि अप्सरा मेनका भी पुष्कर के पवित्र जल में स्नान करने आयी थी। उसको देख कर ही विश्वामित्र काम के वशीभूत हो गए थे। वे दस साल तक मेनका के संसर्ग में रहे, जिससे शकुन्तला नामक पुत्र का जन्म हुआ। भगवान राम ने अपने पिताश्री दशरथ का श्राद्ध मध्य पुष्कर के निकट गया कुंड में ही किया था।

मध्य काल में पुष्कर : यहाँ औरंगजेब और जोधपुर के महाराज अजीत सिंह के बीच हुए युद्ध में दोनों ओर के सात हज़ार सैनिक शहीद हुए थे। अजमेर के सूबेदार तहव्वुर खान को विजय मिली और उत्सव मनाने के लिए उसने एक हज़ार गायें काटने का ऐलान किया। इस पर राजपूतों ने फिर युद्ध कर तहव्वुर को भगा दिया। जीत की खुशी में गाय की प्रतिमा स्थापित की। यही प्रतिमा आज गऊ घाट पर विद्यमान है। गऊ घाट के पास शाही मस्जिद तहव्वुर ने बनवाई थी। मंदिर पुष्कर के पवित्र शहर में प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है शिव को समर्पित, यह मंदिर 12 वीं सदी की शुरुआत में बनाया गया था और एक भूमिगत खंड है। मुगल सम्राट, औरंगजेब ने पहले संरचना को नष्ट कर दिया था लेकिन बाद में इसे फिर से बनाया गया था। ब्रह्मा मंदिर सहित कई पुराने मंदिरों को मुगल सम्राट औरंगजेब के शासनकाल में ध्वस्त कर दिया गया था।ये मंदिर बाद में फिर से बनाया गया था यद्यपि मूल ब्रह्मा मंदिर को 2000 वर्ष का होना कहा जाता है, वर्तमान मंदिर संरचना 14 वीं शताब्दी में है जोधपुर, जयपुर, कोटा, भरतपुर आदि रियासतों के राजाओं ने घाट बनवाए। पुष्कर जैनों को भी पवित्र तीर्थ रहा है। जैनों की पट्टावलियों व वंशावलियों में यह क्षेत्र पद्मावती के नाम से विख्यात था। जिनपति सूरी ने ईसा पश्चात् 1168, 1188 व 1192 में इस स्थान की यात्रा की और अनेक लोगों को दीक्षा दी। पुष्कर में पौराणिक महत्व का वराह मंदिर मुगलों व मराठों के एक घमासान युद्ध का गवाह रहा है।

पुष्कर एक पर्यटन स्थल: पुष्कर का शाब्दिक अर्थ तालाब भी है। प्रसिद्ध पर्यटक आकर्षण ब्रह्मा मंदिर है, जो हजारों भक्तों और पर्यटकों को आकर्षित करता है। पुष्कर झील एक और जगह है जिसे पुष्कर में देखना चाहिए। आप सरस्वती मंदिर तक पहुंचने और पुष्कर झील के मनोरम दृश्य का आनंद लेने के लिए पहाड़ी की चोटी पर भी यात्रा कर सकते हैं। रत्नागिरी नामक एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित सावित्री मंदिर ब्रह्मा की पत्नी सावित्री को समर्पित है। पुष्कर झील के सुंदर दृश्य को देखने के लिए आप पहाड़ी पर चढ़ सकते हैं। यह मंदिर लगभग 750 फीट की ऊंचाई पर स्थित है जो कि शहर में दूसरा सबसे महत्वपूर्ण मंदिर है जिसमे सावित्री की आरती का सबसे पहले होती है पुष्कर झील में 52 घाट हैं, जो झील के किनारे तक जाने के लिए पत्थर के कदम हैं। पुष्कर मेला (अक्टूबर-नवंबर) के दौरान, कार्तिक पूर्णिमा जैसे शुभ दिनों के दौरान एक पवित्र स्नान के लिए इन घाटों पर भारी भीड़ होगी है झील के 52 घाटों में, परिधि पर स्थित दस घाट, जो कि गंगाौर घाट, करनी घाट, जयपुर घाट, यघ घाट, गौ घाट, कोटा घाट, ग्वालियर घाट, सप्तर्षि घाट, दढच घाट और वरहा घाट हैं, उन्हें 'राष्ट्रीय महत्व के स्मारक' के रूप में वर्गीकृत किया गया है। गौ घाट को अब महात्मा गांधी घाट कहा जाता है, जबकि ब्रह्मा घाट का नाम इसलिए था क्योंकि यह कहा जाता है कि ब्रह्मा ने यहाँ स्नान किया था। वराहा घाट को बुलाया जाता है, क्योंकि यह माना जाता है कि विष्णु अपने सूअर (वराहा) अवतार में इस स्थल पर उपस्थित थे।

शहर में गांधी घाट एक महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि घाट पर महात्मा गांधी की राख छिड़की गई थी। पुष्कर में स्थित, पुष्कर झील सबसे लोकप्रिय पर्यटक आकर्षणों में से एक है। इस स्थल पर ब्रह्मा ने कमल को छोड़ दिया था, तो झील बनाई गई थी। इसे तीर्थ राज कहा जाता है, जिसका अर्थ है तीर्थ स्थान का राजा। इस झील का पवित्र पानी पापों को धोता है। माना जाता है कि झील के पानी में इलाज और औषधीय गुण हैं। झील का इतिहास 4 वीं शताब्दी ईसा पूर्व में है उस अवधि से सिक्कों में झील का उल्लेख किया गया है। सांची में शिलालेख के अनुसार, भी झील 2 वीं शताब्दी ईसा पूर्व में अस्तित्व में थी।

राजा मान सिंह का मुख्य (मैन) महल पुष्कर के सबसे बड़े महलों में से एक है। यह महल शहर में सबसे लोकप्रिय पर्यटक स्थलों में से एक है। मैन महल शाही काल के अपने भव्य राजस्थानी स्थापत्य शैली का प्रतिबिम्ब है। यह महल अब एक हैरिटेज होटल में परिवर्तित कर दिया गया है पुराने रंगजी का मंदिर पुष्कर में सबसे दिलचस्प मंदिरों में से एक है। यह मंदिर भगवान रंगजी को समर्पित है, जो कि विष्णु का अवतार है। हजारों पर्यटक और भक्त हिंदू मंदिर में हर साल जाते हैं। मंदिर की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता इसकी वास्तुकला है, जो राजपूत, मुगल और दक्षिण भारतीय स्थापत्य शैली का एक अनूठा मिश्रण है। रंगजी मंदिर संरचना में एक उच्च गोपुरम शामिल है, जिसे आमतौर पर दक्षिण भारतीय मंदिरों में देखा जाता है। पुष्कर में सरस्वती नदी के स्नान का सर्वाधिक महत्त्व है। यहाँ सरस्वती नाम की एक प्राचीन पवित्र नदी है। यहाँ पर वह पाँच नामों से बहती है। पुष्कर स्नान कार्तिक पूर्णिमा को सर्वाधिक पुण्यप्रद माना जाता है। इस पुष्कर क्षेत्र में पंचश्रोता सरस्वती, प्राणियों के पाप दूर करने के लिए ब्रह्मलोक से आकर ठहरी हैं और उनका सुप्रभा, चंद्रा, नंदा, प्राची, सरस्वती- ये पांच श्रोत स्थित हैं। ज्येष्ठ पुष्कर में सुप्रभा नदी, मध्य पुष्कर में शुद्ध नदी और कनिष्ठ पुष्कर में कनका, नंदा और प्राची सरस्वती नदी बहती है और मंगलकारणी,विष्णु पदि, पद-पद पर पर्वतों-शिखरों को धोती है। जिसके दर्शन मात्र से मनुष्य पापों से छूट जाता है। बताते है कि नंदा सरस्वती ही मौलिक रूप से सरस्वती नदी है। नाग तीर्थ यज्ञ पर्वत के किनारे पर नाग तीर्थ प्रसिद्ध हैं, वहां स्नान करने वाले मनुष्य को सांप काटने से कभी मृत्यु नहीं होती है।

नारद जी नारद जी की मूर्ति: एक मन्दिर में हाथी पर बैठे कुबेर तथा नारद की मूर्तियाँ हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण में उल्लिखित है कि अपने मानस पुत्र नारद द्वारा सृष्टिकर्म करने से इन्कार किए जाने पर ब्रह्मा ने उन्हें रोषपूर्वक शाप दे दिया कि—"तुमने मेरी आज्ञा की अवहेलना की है, अतः मेरे शाप से तुम्हारा ज्ञान नष्ट हो जाएगा और तुम गन्धर्व योनि को प्राप्त करके कामिनियों के वशीभूत हो जाओगे।" तब नारद ने भी दुःखी पिता ब्रह्मा को शाप दिया—"तात! आपने बिना किसी कारण के सोचे - विचारे मुझे शाप दिया है। अतः मैं भी आपको शाप देता हूँ कि तीन कल्पों तक लोक में आपकी पूजा नहीं होगी और आपके मंत्र, श्लोक कवच आदि का लोप हो जाएगा।" तभी से ब्रह्मा जी की पूजा नहीं होती है। मात्र पुष्कर क्षेत्र में ही वर्ष में एक बार उनकी पूजा–अर्चना होती है।

पुष्कर का मेला: यहाँ प्रतिवर्ष दो विशाल मेलों का आयोजन किया जाता हैं। कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक यहाँ पर एक विशाल मेला लगता है। दूसरा मेला वैशाख शुक्ला एकादशी से पूर्णिमा तक रहता है। मेलों के रंग राजस्थान में देखते ही बनते हैं। लोग इस मेले को श्रद्धा, आस्था और विश्वास का प्रतीक मानते हैं। पुष्कर मेला थार मरुस्थल का एक लोकप्रिय व रंगों से भरा मेला है। पुष्कर मेले का एक रोचक अंग ऊँटों का क्रय–विक्रय है। निस्संदेह अन्य पशुओं का भी व्यापार किया जाता है, परन्तु ऊँटों का व्यापार ही यहाँ का मुख्य आकर्षण होता है। मीलों दूर से ऊँट व्यापारी अपने पशुओं के साथ में पुष्कर आते हैं। पच्चीस हज़ार से भी अधिक ऊँटों का व्यापार यहाँ पर होता है। यह सम्भवतः ऊँटों का संसार भर में सबसे बड़ा मेला होता है। इस दौरान लोग ऊँटों की सवारी कर ख़रीददारों का अपनी ओर लुभाते हैं। पुष्कर को 'राजस्थान का गुलाब उद्यान' भी कहा जाता है, क्योंकि शहर में और आसपास के फूलों की खेती होती है | पहाड़ियों से घिरा, पुष्कर भक्तों और पर्यटकों के बीच एक लोकप्रिय गंतव्य है। हाल में, पुष्कर भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों के बीच सबसे प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों में से एक बन गया है। नवंबर में आयोजित होने वाली वार्षिक पुष्कर ऊंट मेला, एक बड़ी भीड़ खींचने वाला है। यहाँ की आध्यात्मिकता और शांति आपको पुष्कर के प्यार में सुकून से भर देगी । सुंदर वास्तुशिल्प यहाँ की विरासत और इतिहास हैं और संगीत वाद्ययंत्रों से भरी दुकानें पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है |

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